''कुछ अनकही''
........2........
क्या ग़लत है क्या सही
यह सोचते सोचते ही ,
हम ने जिंदगी गुज़ार दी
इसलिए कुछ ना किया,
न ग़लत न सही
ऊपर वाले ने जो भी जिंदगी दी
लगता है सब बेकार गई
तमन्नाएँ जितनी भी थी
या तो गैर क़ानूनी थी या
उसने किसी और की झोली में डाल दी
इसलिए कुछ नहीं किया
न ग़लत न सही
जिंदगी में शायद अब
कोई तमन्ना और ना रही!!
...................यशपाल भाटिया [26दिसंबर,1997]
![Photo: दोस्तो कुछ काव्य रचनाएँ जो कभी बहुत पहले
लिखीं थी आज आप लोगों के साथ बाँटना चाहता
हूँ...''कुछ अनकही''...और आशा करता हूँ आप सबको
यह पसंद आएँगी और आप सब की हौंसला अफ़साई
इस में और इज़ाफ़ा करने में पूर्णतया सहायक होगी........
''कुछ अनकही''
........1..........
कुरेदो किसी भी इंसान को, अपना सा लगता है
दिल में उसके भी ,एक जख्म कहीं पलता है
हर शख्स दोहरी सी जिंदगी जीता है
हंसता है महफ़िल में,अक्सर अकेले में रोता है
सारी दुनिया से जीत जाता है,
लेकिन अपनों से ही हमेशा हारता है
पूछो उससे तो कहता है,
वो तो दुनिया भर का मज़ा मारता है
आस का पंछी दूर डाल पर होता है
ना ही उड़ता है और ना हाथ आता है
दर्द हर इंसान का,इंसान अपने सा ही पाता है
इंसान फिर भी ना जाने क्यों जीना चाहता है?
..................यशपाल भाटिया [26दिसंबर,1997]](https://fbcdn-sphotos-e-a.akamaihd.net/hphotos-ak-ash3/p480x480/395356_299605013436165_419598267_n.jpg)